मिट्टी के कुल्हड़ बनाकर ममता प्रजापति बनीं आत्मनिर्भर, हर महीने कमा रहीं 16 हजार रुपये

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सहायता समूह की सदस्य ने पारंपरिक हुनर को आधुनिक तकनीक से जोड़ा, सालाना करीब 2 लाख रुपये की आय से परिवार को दे रहीं आर्थिक मजबूती

 

झांसी। उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के चिरगांव विकासखंड के उज्ज्यान गांव की रहने वाली 30 वर्षीय ममता प्रजापति ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता की प्रेरणादायी मिसाल बनकर उभरी हैं। कभी परिवार की सीमित आय में सहयोग करने के लिए रोजगार की तलाश करने वाली ममता आज मिट्टी के कुल्हड़ और कप बनाने का अपना उद्यम चला रही हैं। स्वयं सहायता समूह से जुड़कर उन्होंने पारंपरिक मिट्टी के उत्पादों को आधुनिक तकनीक से जोड़ा और अपने हुनर को कमाई का जरिया बनाया। इस उद्यम से उन्हें औसतन 16 हजार रुपये प्रतिमाह और करीब 2 लाख रुपये सालाना आय प्राप्त हो रही है।

 

स्वयं सहायता समूह से मिली नई राह

 

ममता प्रजापति ने दसवीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की है। विवाह के बाद उनका अधिकांश समय घर-परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने में बीतता था। उनके पति दिहाड़ी मजदूरी करके परिवार का खर्च चलाते थे। सीमित आमदनी और बढ़ते घरेलू खर्चों के बीच ममता ने महसूस किया कि यदि वह भी रोजगार शुरू करें, तो परिवार की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने में योगदान दे सकती हैं।

 

इसी सोच के साथ उन्होंने आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम बढ़ाया। उनके जीवन में बदलाव की शुरुआत ‘अमृत माटी स्वयं सहायता समूह’ से जुड़ने के बाद हुई। समूह की बैठकों में भाग लेने से उन्हें बचत, आर्थिक अनुशासन, सामूहिक प्रयास और धन प्रबंधन की समझ मिली। समूह से प्राप्त प्रेरणा और सहयोग ने उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया और अपना व्यवसाय शुरू करने का रास्ता तैयार किया।

 

ऋण लेकर शुरू की मिट्टी के कुल्हड़ बनाने की इकाई

 

स्वयं सहायता समूह के सहयोग से ऋण प्राप्त करने के बाद ममता ने मिट्टी के कुल्हड़ बनाने की इकाई स्थापित करने का निर्णय लिया। उन्होंने पारंपरिक मिट्टी के काम को आधुनिक मशीनों से जोड़ते हुए कुल्हड़ और मिट्टी के कप बनाने का काम शुरू किया।

 

मशीन के इस्तेमाल से उत्पादन क्षमता बढ़ाने और शारीरिक श्रम कम करने में मदद मिली। धीरे-धीरे ममता ने उत्पादन की प्रक्रिया को समझा, उत्पादों की गुणवत्ता पर ध्यान दिया और स्थानीय बाजार की मांग के अनुरूप अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाया।

 

शुरुआती दौर में उनके सामने कच्चे माल की व्यवस्था, बाजार की जरूरतों को समझने, ग्राहकों तक उत्पाद पहुंचाने और व्यवसाय का हिसाब-किताब रखने जैसी कई चुनौतियां आईं। हालांकि, उन्होंने इन कठिनाइयों को सीखने के अवसर के रूप में लिया और निरंतर प्रयासों से अपने उद्यम को मजबूत बनाया।

 

प्रशिक्षण से मिला व्यवसाय बढ़ाने का मार्गदर्शन

 

ममता के उद्यम को आगे बढ़ाने में प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन की भी अहम भूमिका रही। उन्हें स्टार्ट एवं इम्प्रूवमेंट ऑफ माइक्रो एंटरप्राइजेज से संबंधित प्रशिक्षण के माध्यम से डेवलपमेंट अल्टरनेटिव्ज का सहयोग मिला।

 

प्रशिक्षण के दौरान उन्हें व्यवसाय की योजना बनाने, उत्पादन प्रक्रिया में सुधार, लागत प्रबंधन, बाजार की संभावनाओं को समझने और उत्पादों की बिक्री के लिए बाजार से जुड़ाव विकसित करने की जानकारी दी गई। इसके साथ ही बैनर सपोर्ट और बही-खाता रखने के लिए रजिस्टर उपलब्ध कराए गए, जिससे व्यवसाय को व्यवस्थित ढंग से संचालित करने में मदद मिली।

 

प्रशिक्षण से प्राप्त जानकारी का उपयोग करते हुए ममता ने अपने काम को बेहतर तरीके से व्यवस्थित किया। इससे उन्हें उत्पादन, लागत और बाजार की जरूरतों को समझने में सहायता मिली।

 

हर महीने 16 हजार रुपये की औसत आय

 

ममता प्रजापति के प्रयासों का परिणाम उनकी आमदनी में दिखाई दे रहा है। मिट्टी के कुल्हड़ और कप बनाने की इकाई से उन्हें औसतन 16 हजार रुपये प्रतिमाह की आय प्राप्त हो रही है। इस तरह उनकी वार्षिक आय करीब 2 लाख रुपये बताई गई है।

 

उनकी इकाई में तैयार होने वाले मिट्टी के उत्पाद स्थानीय बाजार और आसपास के क्षेत्रों में उपयोग किए जा रहे हैं। पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों के प्रति बढ़ती जागरूकता के बीच मिट्टी के कुल्हड़ों की मांग उनके व्यवसाय के लिए नए अवसर उपलब्ध करा सकती है।

 

ममता अब अपने उद्यम को और अधिक विस्तार देने की दिशा में काम करना चाहती हैं। उनका लक्ष्य उत्पादन बढ़ाना, बाजार से बेहतर जुड़ाव स्थापित करना और भविष्य में अन्य ग्रामीण महिलाओं के लिए भी रोजगार के अवसर पैदा करना है।

 

ग्रामीण महिलाओं के लिए बनीं प्रेरणा

 

ममता की सफलता की खास बात यह है कि उन्होंने परिवार की जिम्मेदारियों के साथ अपने व्यवसाय को भी आगे बढ़ाया। स्वयं सहायता समूह से मिले सहयोग, प्रशिक्षण से प्राप्त जानकारी और अपनी मेहनत के बल पर उन्होंने गांव में रहकर ही कमाई का साधन विकसित किया।

 

उनकी कहानी यह संदेश देती है कि सही मार्गदर्शन, वित्तीय सहायता, कौशल प्रशिक्षण और बाजार तक पहुंच मिलने पर ग्रामीण महिलाएं अपने पारंपरिक हुनर को व्यवसाय में बदल सकती हैं। इससे न केवल परिवार की आय बढ़ाने में मदद मिलती है, बल्कि महिलाओं के आत्मविश्वास और आर्थिक भागीदारी को भी मजबूती मिलती है।

 

महिला आत्मनिर्भरता की दिशा में स्वयं सहायता समूहों की भूमिका

 

स्वयं सहायता समूह ग्रामीण महिलाओं को बचत, ऋण, प्रशिक्षण और सामूहिक सहयोग के माध्यम से रोजगार के अवसर विकसित करने में मदद करते हैं। ममता प्रजापति का उदाहरण बताता है कि इन समूहों के माध्यम से महिलाएं छोटे स्तर पर उद्यम शुरू करके धीरे-धीरे अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर सकती हैं।

 

प्रदेश में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से संचालित योजनाओं और प्रशिक्षण पहलों का महत्व इसी तरह के उदाहरणों से सामने आता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार की महिला सशक्तीकरण संबंधी पहलों के संदर्भ में ममता की कहानी ग्रामीण स्तर पर उद्यमशीलता की संभावनाओं को दर्शाती है।

 

मिट्टी को आकार देकर कुल्हड़ और कप बनाने वाली ममता प्रजापति ने अपने हुनर के साथ अपने सपनों को भी नई दिशा दी है। आज उनका उद्यम परिवार की आर्थिक जरूरतों में योगदान देने के साथ ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता और स्वरोजगार की प्रेरणा प्रस्तुत कर रहा है।