पुदीना-अजवाइन में मिला फेफड़ों के कैंसर पर असर डालने वाला यौगिक, कीमोथेरेपी के साइड इफेक्ट्स कम करने की उम्मीद

pudina-ajaawaayin-1792986617073

लखनऊ: फेफड़ों के कैंसर के इलाज को लेकर वैज्ञानिकों ने एक प्राकृतिक यौगिक पर शोध किया है। सीएसआईआर-केंद्रीय औषधीय एवं सुगंध पौधा संस्थान (सीमैप) और सीएसआईआर-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई) के वैज्ञानिकों ने पुदीने और अजवाइन की विशेष प्रजातियों में पाए जाने वाले कार्वीओल (Carveol) नामक यौगिक का अध्ययन किया है। प्रयोगशाला में किए गए परीक्षणों में इस यौगिक ने नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर की कोशिकाओं पर असर दिखाया। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि आगे के शोध से कैंसर के उपचार के लिए नई दवाएं विकसित करने का रास्ता खुल सकता है।

करीब तीन साल तक चले इस शोध के नतीजे 19 अक्टूबर को जर्नल ऑफ मॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर में प्रकाशित हुए। अध्ययन का नेतृत्व सीमैप की वैज्ञानिक डॉ. आभा मीना ने किया। शोध में सीमैप के वैज्ञानिक अनुराग माथुर और एनबीआरआई के वैज्ञानिक भी शामिल रहे।

कैंसर कोशिकाओं पर कैसे असर करता है कार्वीओल?

शोध के अनुसार, कार्वीओल एक प्राकृतिक मोनोटरपेनॉइड यौगिक है। प्रयोगशाला में किए गए परीक्षणों के दौरान इसे फेफड़ों के कैंसर से जुड़ी कोशिकाओं की वृद्धि रोकने और उन्हें नष्ट करने की क्षमता के लिए जांचा गया।

वैज्ञानिकों ने पाया कि यह यौगिक एलओएक्स-5 (LOX-5) नामक एंजाइम की गतिविधि को बाधित कर सकता है। यह एंजाइम सूजन और कैंसर कोशिकाओं की प्रगति से जुड़ी प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है। शोध में सामने आए नतीजे इस बात की संभावना दिखाते हैं कि कार्वीओल को भविष्य में कैंसर के उपचार के लिए विकसित किया जा सकता है।

हालांकि, ये निष्कर्ष अभी प्रयोगशाला आधारित हैं। इससे यह साबित नहीं होता कि पुदीना या अजवाइन खाने से फेफड़ों का कैंसर ठीक हो सकता है।

कीमोथेरेपी के दुष्प्रभाव कम करने की उम्मीद

फेफड़ों के कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कीमोथेरेपी और अन्य उपचारों से स्वस्थ कोशिकाएं भी प्रभावित हो सकती हैं। इसके कारण मरीजों को कई तरह के दुष्प्रभावों का सामना करना पड़ता है।

शोध से जुड़े वैज्ञानिकों के मुताबिक, कार्वीओल जैसे यौगिकों पर आगे अध्ययन करने से ऐसी दवाएं विकसित करने की संभावना तलाश की जा सकती है, जो कैंसर कोशिकाओं को निशाना बनाते हुए स्वस्थ कोशिकाओं को होने वाले नुकसान को कम करें।

हालांकि, इस यौगिक के इंसानों में सुरक्षित होने, इसके वास्तविक प्रभाव और संभावित दुष्प्रभावों को लेकर अभी और वैज्ञानिक परीक्षण जरूरी हैं। फिलहाल इसे कीमोथेरेपी का विकल्प नहीं माना जा सकता।

अभी किन चरणों से गुजरना होगा?

डॉ. आभा मीना के मुताबिक, शोध में नेटवर्क फार्माकोलॉजी, प्रयोगशाला में कोशिकाओं पर परीक्षण और मॉलिक्यूलर सिमुलेशन जैसी विधियों का इस्तेमाल किया गया। इन शुरुआती नतीजों के आधार पर आगे दवा विकसित करने की संभावना पर काम किया जा सकता है।

किसी नई दवा को मरीजों तक पहुंचाने से पहले पशु मॉडल पर परीक्षण और इसके बाद इंसानों पर कई चरणों में क्लीनिकल ट्रायल करना जरूरी होता है। इन परीक्षणों से दवा की सुरक्षा, प्रभावशीलता, उचित खुराक और संभावित दुष्प्रभावों का आकलन किया जाता है।

इस पूरी प्रक्रिया में कई साल लग सकते हैं। इसलिए कार्वीओल से कैंसर की दवा तैयार होने और उसके बाजार में उपलब्ध होने को लेकर अभी निश्चित समयसीमा बताना संभव नहीं है।

 

एक नज़र