कारगिल युद्ध में GPS मदद से इनकार के बाद भारत ने बदली रणनीति, ISRO का NVS-03 बनेगा NavIC की नई ताकत
कारगिल युद्ध के बाद भारत ने अपना नेविगेशन सिस्टम बनाने का फैसला क्यों किया?
अमेरिका का GPS दुनिया की प्रमुख सैटेलाइट नेविगेशन प्रणालियों में शामिल है। इसका संचालन अमेरिकी सरकार करती है। वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान भारत ने अमेरिका से GPS की सैन्य जानकारी मांगी थी, लेकिन उसे यह सहायता नहीं मिली। इस घटना से भारत को यह समझ आया कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में किसी दूसरे देश की तकनीक पर पूरी तरह निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है।
इसके बाद भारत ने अपना क्षेत्रीय नेविगेशन सिस्टम विकसित करने की दिशा में काम शुरू किया। इसी प्रयास से NavIC यानी नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन अस्तित्व में आया। शुरुआत में इसे भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (IRNSS) कहा जाता था। इसकी शुरुआत कारगिल युद्ध के बाद हुई और वर्ष 2013 में इसका पहला सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजा गया।
NavIC को भारत और इसकी सीमाओं से करीब 1,500 किलोमीटर आगे तक के क्षेत्र में नेविगेशन सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।
NVS-03 सैटेलाइट में क्या है खास?
NVS-03 इसरो की नई पीढ़ी के नेविगेशन सैटेलाइटों में शामिल है। इसका वजन करीब 2,232 किलोग्राम है। इसे GSLV-F18 रॉकेट की मदद से अंतरिक्ष में भेजा गया। इसरो के अनुसार, रॉकेट ने उपग्रह को निर्धारित ट्रांसफर ऑर्बिट में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया है।
इस सैटेलाइट की सबसे बड़ी खासियत इसमें लगाई गई स्वदेशी परमाणु घड़ी है। यह बेहद सटीक समय बताने में सक्षम है। सैटेलाइट नेविगेशन में समय की सटीकता बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इसी के आधार पर किसी व्यक्ति, वाहन या अन्य वस्तु की सही स्थिति का पता लगाया जाता है।
दरअसल, सैटेलाइट से भेजे गए सिग्नल को धरती तक पहुंचने में जितना समय लगता है, उसी के आधार पर लोकेशन की गणना की जाती है। समय में मामूली अंतर आने पर भी स्थिति की गणना प्रभावित हो सकती है। NavIC के कुछ पुराने उपग्रहों में लगी परमाणु घड़ियों में खराबी आने के बाद इस क्षेत्र में चुनौतियां सामने आई थीं। ऐसे में NVS-03 में स्वदेशी परमाणु घड़ी का इस्तेमाल भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
इस उपग्रह में L1 बैंड का सिग्नल भी शामिल किया गया है। इसके अलावा यह पहले से इस्तेमाल हो रहे L5 और S बैंड के सिग्नल भी भेजेगा। इससे NavIC की सेवाओं की उपयोगिता बढ़ाने और अलग-अलग उपकरणों के साथ इसकी अनुकूलता बेहतर करने में मदद मिलेगी।
तकनीकी चुनौतियों से कमजोर हुआ था NavIC सिस्टम
भारत के स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम को पिछले कुछ वर्षों में कई तकनीकी समस्याओं का सामना करना पड़ा है। कुछ पुराने उपग्रहों की परमाणु घड़ियां खराब हो गईं, जबकि कुछ सैटेलाइट अपनी निर्धारित कक्षा तक नहीं पहुंच पाए।
जनवरी 2025 में प्रक्षेपित NVS-02 इसका उदाहरण है। रॉकेट ने इस उपग्रह को शुरुआती कक्षा में पहुंचा दिया था, लेकिन तकनीकी खराबी के कारण यह अपनी अंतिम निर्धारित कक्षा तक नहीं पहुंच सका।
29 जुलाई 2026 को लोकसभा में सरकार की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, उस समय NavIC के पास पोजिशनिंग सेवाओं के लिए केवल तीन परिचालन सैटेलाइट थे। किसी स्थान की स्वतंत्र रूप से सटीक स्थिति बताने के लिए कम से कम चार परिचालन उपग्रहों की जरूरत होती है। इस वजह से NavIC की टाइमिंग सेवा काम कर रही थी, लेकिन पोजिशनिंग सेवाओं के लिए जरूरी न्यूनतम संख्या पूरी नहीं हो पा रही थी।
NVS-03 का सफल प्रक्षेपण इस कमी को दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, उपग्रह को अंतिम कक्षा में पहुंचाने और पूरी तरह परिचालन में लाने की प्रक्रिया अभी बाकी है।
मोबाइल से लेकर सेना और रेलवे तक मिलेगा फायदा
NavIC का इस्तेमाल केवल मोबाइल फोन पर रास्ता बताने तक सीमित नहीं है। इसका लाभ रेलवे, विमानन, समुद्री परिवहन, मछुआरों, बैंकिंग, बिजली ग्रिड और रक्षा क्षेत्र को भी मिल सकता है।
समुद्र में मछुआरों को मौसम और आपदा से जुड़ी चेतावनी पहुंचाने से लेकर सेना को सटीक लोकेशन संबंधी जानकारी देने तक इस तकनीक की उपयोगिता है। बैंकिंग और दूरसंचार जैसी सेवाओं में भी सटीक समय का विशेष महत्व होता है। NavIC की टाइमिंग सुविधा इन क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो सकती है।
इसरो की योजना NVS-04 और NVS-05 जैसे अगले नेविगेशन सैटेलाइटों को भी अंतरिक्ष में भेजने की है। इनके प्रक्षेपण से भारत की स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।
कारगिल युद्ध के दौरान सामने आई विदेशी तकनीक पर निर्भरता की चुनौती से शुरू हुआ भारत का यह सफर अब अपने नेविगेशन सिस्टम को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। NVS-03 की सफलता इसी प्रयास का एक अहम पड़ाव है। इसका उद्देश्य देश को नेविगेशन और सटीक समय संबंधी सेवाओं के लिए दूसरे देशों की प्रणालियों पर निर्भरता कम करने में सक्षम बनाना है।
