Hindu Nav Varsh 2026: नवसंवत्सर का आगाज, जानिए इस साल के ‘राजा’ और ‘मंत्री’ कौन होंगे

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नई दिल्ली। हिंदू पंचांग के अनुसार आज से नवसंवत्सर 2083 का शुभारंभ हो गया है। चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरू होने वाले इस भारतीय नववर्ष को विक्रम संवत भी कहा जाता है। इसी दिन से वासंतिक नवरात्र की भी शुरुआत होती है, जिसे धर्म और आस्था के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

नवसंवत्सर का महत्व और परंपरा
भारतीय परंपरा में नवसंवत्सर का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इसी दिन से सृष्टि चक्र में परिवर्तन शुरू होता है और प्रकृति में भी नए बदलाव दिखाई देते हैं। इस नववर्ष की शुरुआत राजा विक्रमादित्य द्वारा की गई थी, इसलिए इसे विक्रम संवत के नाम से जाना जाता है। इस दिन से ऋतुओं का परिवर्तन भी आरंभ होता है।

इस वर्ष का नाम और ज्योतिषीय संकेत
विक्रमी संवत 2083 को ‘रौद्र’ नाम दिया गया है। हर वर्ष की तरह इस बार भी ग्रहों के आधार पर पूरे साल के लिए एक ‘मंत्रिमंडल’ निर्धारित किया गया है, जिसके अनुसार वर्ष भर के शुभ-अशुभ फल तय होते हैं। इसका असर मौसम, अर्थव्यवस्था, कृषि और जनजीवन पर पड़ता है।

कौन होंगे साल के राजा और मंत्री?
ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस वर्ष के राजा बृहस्पति और मंत्री मंगल होंगे। बृहस्पति के राजा होने से धर्म, शिक्षा और कानून से जुड़े क्षेत्रों में सुधार की संभावना जताई जा रही है। वहीं मंगल के मंत्री होने के कारण जनसामान्य को कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। अग्नि, दुर्घटना और संघर्ष की स्थितियां बढ़ने की आशंका भी व्यक्त की गई है।
इसके अलावा, मेघेश चंद्रमा को माना गया है, जिससे वर्षा की स्थिति सामान्य से बेहतर रहने के संकेत मिल रहे हैं।

ग्रहों का विशेष संयोग और असर
नववर्ष की शुरुआत के समय सूर्य, शनि और शुक्र मीन राशि में स्थित रहेंगे, जबकि बृहस्पति मिथुन राशि में होंगे। राहु कुंभ और केतु सिंह राशि में रहेंगे।
साल के दौरान कई बड़े ग्रह परिवर्तन भी होंगे। 2 जून 2026 को बृहस्पति कर्क राशि में प्रवेश करेंगे और 31 अक्टूबर को सिंह राशि में चले जाएंगे। वहीं 5 दिसंबर को राहु मकर और केतु कर्क राशि में गोचर करेंगे। इन बदलावों का प्रभाव अलग-अलग राशियों पर पूरे वर्ष देखने को मिल सकता है।

नववर्ष के पहले दिन क्या करें?
नवसंवत्सर के दिन सुबह स्नान के बाद सूर्य देव को अर्घ्य देना शुभ माना जाता है। घर के मुख्य द्वार को सजाना, ईष्ट देव की पूजा करना और गंध, अक्षत व पुष्प से विधिवत आराधना करना लाभकारी बताया गया है।
इसके अलावा पारंपरिक रूप से नीम के पत्तों, मसालों और इमली का मिश्रण सेवन करने की भी परंपरा है, जिसे स्वास्थ्य और शुभता से जोड़कर देखा जाता है।

 

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