नेपाल चुनाव 2026: प्रचार का सन्नाटा, लेकिन बदलाव की गूंज तेज; भ्रष्टाचार और पलायन बना सबसे बड़ा मुद्दा
नई दिल्ली। नेपाल में चुनावी माहौल इस बार पारंपरिक शोर-शराबे से बिल्कुल अलग नजर आ रहा है। न सड़कों पर बड़े-बड़े होर्डिंग्स की चमक है, न लाउडस्पीकरों का शोर और न ही गलियों में पोस्टरों की भीड़। पहली नजर में माहौल सामान्य दिखता है, लेकिन भीतर ही भीतर बदलाव की एक मजबूत लहर बह रही है। प्रतिनिधि सभा के चुनाव से ठीक पहले पूरा देश मानो एक ‘खामोश क्रांति’ की ओर बढ़ रहा है।
खामोशी में परिपक्वता का संदेश
मतदान से पहले तक नेपाल अपनी रोजमर्रा की रफ्तार में चलता दिखता है। यह सन्नाटा उदासीनता का नहीं, बल्कि मतदाताओं की परिपक्वता का संकेत माना जा रहा है। राजशाही के अवसान के बाद जनता लगभग सभी प्रमुख दलों को सत्ता सौंपकर देख चुकी है। अब फोकस जवाबदेही पर है।
धनगढ़ी की सड़कों पर चर्चा का विषय अब भावनात्मक मुद्दे नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार, अवरुद्ध विकास, बेरोजगारी और युवाओं का लगातार पलायन है। जनता की प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं और इस बार मतदाता पुराने नारों से प्रभावित होते नहीं दिख रहे।
डोर-टू-डोर प्रचार, लेकिन मतदाता सतर्क
राजनीतिक दलों के केंद्रीय कार्यालयों में भले सन्नाटा हो, लेकिन नेता घर-घर जाकर जनसंपर्क में जुटे हैं। फर्क इतना है कि इस बार मतदाता चुनावी लहर में बहने के मूड में नहीं हैं। युवा वर्ग, खासकर ‘जेन-जी’ आंदोलन के बाद, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बेहद मुखर नजर आ रहा है।
1989 में राजशाही के अंत के बाद से 165 सदस्यीय प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व वाली संसद में मुख्य रूप से Nepali Congress, CPN (UML) और CPN (Maoist Centre) जैसी पार्टियों ने सत्ता संभाली है, लेकिन बुनियादी जरूरतें अब भी पूरी नहीं हो सकीं।
जमीनी आवाज: बदलाव की मांग
धनगढ़ी के कारोबारी रमेश काफेल साफ कहते हैं कि सरकार का काम सिर्फ वोट लेकर शासन करना नहीं, बल्कि जनता की मूलभूत जरूरतों को पूरा करना भी है। हार्डवेयर व्यापारी सुरेंद्र भट्ट का मानना है कि इस बार खामोश जनता का फैसला चौंकाने वाला हो सकता है। ट्रांसपोर्ट व्यवसायी दिलीराज भट्ट का कहना है कि धनगढ़ी से काठमांडू तक बदलाव की लहर महसूस की जा रही है। काठमांडू में मेयर के रूप में Balendra Shah के कार्यकाल के बाद लोगों को विकल्प की संभावना पर भरोसा बढ़ा है।
मतदान और मतगणना की प्रक्रिया
पांच मार्च को सुबह सात बजे से शाम पांच बजे तक मतदान होगा। उसी रात या अगले दिन सुबह से मतगणना शुरू होने की संभावना है। प्रत्यक्ष चुनाव के परिणाम तीन से पांच दिनों में आने लगते हैं, जबकि समानुपातिक प्रणाली की गणना में 10 से 15 दिन तक का समय लग सकता है। मतदान को सुगम बनाने के लिए चार से छह मार्च तक सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया है।
इस बार 9.15 लाख नए मतदाता
2022 के मुकाबले इस बार करीब 9.15 लाख नए मतदाता जुड़े हैं, जिनमें बड़ी संख्या युवाओं की है। प्रत्यक्ष निर्वाचन के लिए 68 राजनीतिक दल मैदान में हैं। देशभर में 10,967 मतदान स्थल और 23,112 मतदान केंद्र बनाए गए हैं। निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए लगभग 3.20 लाख सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई है।
नेपाल चुनाव एक नजर में
कुल मतदाता: लगभग 1,89,03,689
कुल सीटें: 275 (बहुमत के लिए 138 आवश्यक)
165 सीटें: प्रत्यक्ष निर्वाचन
110 सीटें: समानुपातिक प्रतिनिधित्व
प्रत्यक्ष प्रणाली के तहत कुल उम्मीदवार: लगभग 3,500
समानुपातिक सूची में महिला उम्मीदवार: लगभग 1,772 (56% से अधिक)
स्वतंत्र उम्मीदवार: लगभग 1,187
प्रमुख दल: Nepali Congress, CPN (UML), CPN (Maoist Centre), राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी
क्या है समानुपातिक चुनाव प्रणाली?
नेपाल में 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा के लिए मिश्रित चुनाव प्रणाली लागू है। मतदाता को दो मतपत्र मिलते हैं। पहला मतपत्र प्रत्यक्ष उम्मीदवार के लिए होता है, जबकि दूसरा किसी राजनीतिक दल के पक्ष में। राष्ट्रीय स्तर पर पार्टियों को मिले वोट प्रतिशत के आधार पर 110 समानुपातिक सीटें आवंटित की जाती हैं। किसी पार्टी को इस कोटे में सीट पाने के लिए कम से कम तीन प्रतिशत वैध मत हासिल करना जरूरी है। कुल निर्वाचित सदस्यों में 33 प्रतिशत महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य है।
जनादेश क्या होगा, इसका फैसला परिणाम आने पर होगा, लेकिन संकेत साफ हैं—नेपाल का मतदाता अब पारंपरिक मुद्दों से आगे बढ़ चुका है और जवाबदेही व ठोस बदलाव की मांग कर रहा है।
