शंख फूंकने के चमत्कारी फायदे: सेहत, मन और पर्यावरण तीनों पर पड़ता है सकारात्मक असर, आयुर्वेद में बताया गया वैज्ञानिक महत्व

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पटना। भारतीय संस्कृति में शंख फूंकना केवल पूजा-पाठ या धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि आयुर्वेद और योगशास्त्र में इसे एक प्रभावी स्वास्थ्य अभ्यास माना गया है। राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज के प्राध्यापक डॉ. अमरेंद्र कुमार सिंह के अनुसार शंखनाद को प्राणायाम, नाद-योग और सात्त्विक ऊर्जा से जोड़ा गया है, जो शरीर, मन और वातावरण तीनों पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।

प्राणायाम की तरह करता है काम
डॉ. सिंह बताते हैं कि शंख फूंकना नियंत्रित श्वास-प्रश्वास का अभ्यास है। इसमें गहरी सांस लेकर धीरे-धीरे हवा बाहर छोड़ी जाती है, जिससे फेफड़ों की वाइटल कैपेसिटी बढ़ती है। इससे श्वसन तंत्र मजबूत होता है और फेफड़ों की मांसपेशियां सशक्त बनती हैं।

दमा और सांस की बीमारियों में राहत
नियमित शंखनाद करने से दमा, एलर्जी, बार-बार खांसी आना और सांस फूलने जैसी समस्याओं में राहत देखी गई है। यह अभ्यास फेफड़ों को अधिक सक्रिय बनाकर शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति बेहतर करता है।

हृदय स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी
गहरी और संतुलित सांस लेने से हृदय गति नियंत्रित रहती है। आयुर्वेद विशेषज्ञों के अनुसार शंखनाद तनाव और बेचैनी को कम करता है, जिससे उच्च रक्तचाप के मरीजों को भी लाभ मिल सकता है।

आवाज और थायरॉयड पर सकारात्मक असर
शंख फूंकने से कंठ और स्वर पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। नियमित अभ्यास से गला साफ रहता है और आवाज में स्पष्टता आती है। शंखनाद के दौरान गले और थायरॉयड क्षेत्र में सूक्ष्म कंपन उत्पन्न होता है, जो इस क्षेत्र की सक्रियता और संतुलन में सहायक माना जाता है।

मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा
मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से शंख को सात्त्विक वस्तु माना गया है। डॉ. अमरेंद्र कुमार सिंह के अनुसार शंखनाद से मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और नकारात्मक विचार, भय व तनाव कम होते हैं। इसे मंगल ध्वनि कहा गया है, जो एकाग्रता बढ़ाने और ध्यान को स्थिर करने में मदद करती है।

पर्यावरण के लिए भी उपयोगी अभ्यास
पर्यावरणीय दृष्टि से शंखनाद की ध्वनि संतुलित और कर्णप्रिय होती है, जो ध्वनि प्रदूषण नहीं फैलाती। प्राचीन काल में सूर्योदय और संध्या के समय शंखनाद की परंपरा इसी कारण थी, ताकि वातावरण में सकारात्मक कंपन बना रहे।

ऊर्जा संरक्षण से जुड़ा सात्त्विक साधन
शंख समुद्री कैल्शियम से निर्मित होता है और इसकी ध्वनि तरंगें जैविक संतुलन बनाए रखने में सहायक मानी जाती हैं। सबसे खास बात यह है कि शंखनाद बिना बिजली और ईंधन के किया जाने वाला अभ्यास है, जो पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल है। विशेषज्ञों का मानना है कि सही विधि और नियमितता के साथ शंख फूंकना जीवनशैली को स्वस्थ, संतुलित और सकारात्मक बना सकता है।

 

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