90 साल की जुड़वा बहनों की रुकी पेंशन, कलेक्टर से बोलीं- साहब, मिट गईं लकीरें, अब कैसे भरें पेट?
मध्य प्रदेश के खंडवा जिले से एक दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है। आनंद नगर की 90 वर्षीय जुड़वा बहनें सीता और शांति पिछले तीन महीनों से भूख और बेबसी की मार झेल रही हैं। कारण बेहद साधारण लेकिन दर्दनाक है—उम्र के साथ उनकी उंगलियों की लकीरें धुंधली हो गई हैं और सरकारी बायोमेट्रिक मशीनें उन्हें पहचानने में नाकाम हैं। नतीजा यह हुआ कि पिछले तीन महीने से उन्हें न राशन मिला और न ही वृद्धावस्था पेंशन।
जब अंगूठा बना दुश्मन
सरकारी नियमों के अनुसार राशन और पेंशन पाने के लिए बायोमेट्रिक मशीन पर अंगूठा लगाना अनिवार्य है। लेकिन सीता और शांति के अंगूठों की लकीरें इतनी धुंधली हो गई हैं कि मशीन ने उन्हें पहचानना ही बंद कर दिया। तकनीकी गलती या सिस्टम की कठोरता ने इन बुजुर्ग महिलाओं के लिए जीवन जीना मुश्किल कर दिया है।
व्हीलचेयर पर कलेक्ट्रेट पहुंचीं बेबसी
चलने-फिरने में असमर्थ ये दोनों बहनें व्हीलचेयर के सहारे कलेक्ट्रेट पहुंचीं। टूटी-फूटी झोपड़ी में रहने वाली इन बहनों के पास अब परिवार के नाम पर कोई नहीं है। पति और भाइयों की मौत के बाद अपनों ने भी किनारा कर लिया। कलेक्ट्रेट में उनकी आंखों में आंसू और चेहरे पर बेबसी देख वहां मौजूद हर शख्स सन्न रह गया।
प्रशासन की जागी नींद
मामला सुर्खियों में आते ही प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया। अपर कलेक्टर ने तुरंत संज्ञान लिया और खाद्य विभाग तथा पेंशन अधिकारियों को मौके पर ही निर्देश दिए। अधिकारियों ने आश्वासन दिया कि तकनीकी बाधाओं को दरकिनार कर उन्हें तत्काल राशन और रुकी हुई पेंशन उपलब्ध कराई जाएगी।
बड़ा सवाल: मशीनी पहचान या मानवीय संवेदना?
यह घटना सिस्टम पर कई गंभीर सवाल खड़े करती है। क्या 90 साल के बुजुर्गों के लिए बायोमेट्रिक के अलावा कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होनी चाहिए? क्या मशीन तय करेगी कि किसी गरीब को रोटी मिलेगी या नहीं? ऐसे मामलों में ‘आईरिस स्कैन’ या ‘फेस रिकग्निशन’ जैसे विकल्पों का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता, यह भी सोचने वाली बात है।
