चांद पर पहुंचा भारत, फिर भी जाति व्यवस्था का कलंक कायम, बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा- कुछ लोगों से अब भी कराया जा रहा अमानवीय काम
मुंबई: सिर पर मैला ढोने की प्रथा को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि भारत भले ही चंद्रमा तक पहुंच गया हो, लेकिन जाति व्यवस्था का सामाजिक कलंक आज भी खत्म नहीं हुआ है। यही व्यवस्था समाज के कुछ लोगों को ऐसे काम करने के लिए मजबूर करती है, जो मानवीय गरिमा के खिलाफ हैं। अदालत ने ये टिप्पणियां खतरनाक सफाई कार्य के दौरान जान गंवाने वाले श्रमिकों के परिजनों को मुआवजा देने से जुड़ी महाराष्ट्र सरकार की नीति को रद्द करते हुए कीं।
निजी संस्थाओं पर जिम्मेदारी डालने की नीति रद्द
जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजुषा देशपांडे की खंडपीठ ने पिछले सप्ताह पारित अपने आदेश में महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया कि खतरनाक सफाई कार्य के दौरान जान गंवाने वाले श्रमिकों के आश्रितों को तत्काल मुआवजा दिया जाए। अदालत ने कहा कि इसके बाद सरकार संबंधित निजी संस्थाओं या नियोक्ताओं से मुआवजे की राशि वसूल सकती है।
अदालत ने राज्य सरकार को छह महीने के भीतर ऐसे सभी लोगों की पहचान करने का भी निर्देश दिया, जिनकी मौत खतरनाक सफाई कार्य के दौरान हुई है। यह कार्य मैला ढोने वालों के रूप में रोजगार के निषेध और उनके पुनर्वास अधिनियम, 2013 की धारा 2(डी) के तहत परिभाषित है।
हर मृतक के आश्रित को 30 लाख रुपये मुआवजा
बॉम्बे हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे प्रत्येक मृत श्रमिक के आश्रितों को राज्य सरकार 30 लाख रुपये का मुआवजा दे। अदालत के मुताबिक मुआवजा देने में देरी नहीं होनी चाहिए और सरकार को प्रभावित परिवारों को तत्काल राहत उपलब्ध करानी होगी।
संविधान में समानता, फिर भी सदियों पुरानी बुराई कायम
अदालत ने कहा कि 21वीं सदी में भारत चंद्रमा के दूसरे हिस्से तक पहुंचने का दावा करता है, लेकिन दूसरी ओर देश में जाति व्यवस्था का सामाजिक कलंक अब भी मौजूद है। यह स्थिति कुछ नागरिकों को मानवीय गरिमा से नीचे माने जाने वाले काम करने के लिए मजबूर करती है।
खंडपीठ ने कहा कि संविधान सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है। इसके बावजूद संविधान अपनाए जाने के 75 साल बाद भी देश उस सामाजिक बुराई से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है, जिसने सदियों से समाज को प्रभावित किया है।
कई कानूनों के बावजूद मैला ढोने की प्रथा पर चिंता
हाई कोर्ट ने कहा कि मैला ढोना ऐसी ही एक अमानवीय प्रथा है, जिसने एक खास समुदाय के लोगों को पीढ़ियों तक इस काम में लगे रहने के लिए मजबूर किया। अदालत ने कहा कि इस प्रथा पर रोक लगाने के लिए कानून बनाए गए हैं और उच्चतम न्यायालय भी कई फैसलों में इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख अपना चुका है। इसके बावजूद इसका पूरी तरह समाप्त न होना गंभीर सामाजिक चिंता का विषय है।
