एक पेरेंट सब संभाले, दूसरा सिर्फ पूछे ‘कितने नंबर आए’… बच्चे के लिए कितनी भारी है ‘पैसेंजर पेरेंटिंग’?

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नई दिल्ली: बच्चों की परवरिश सिर्फ एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि उनके भविष्य को आकार देने की लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। इसमें माता-पिता को हर पड़ाव पर नई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में अगर माता-पिता में से कोई एक बच्चे की परवरिश से लगातार दूरी बनाए रखे, तो इसका असर बच्चे के साथ-साथ दूसरे पेरेंट पर भी पड़ सकता है। इसी स्थिति को आजकल ‘पैसेंजर पेरेंटिंग’ के नाम से समझा जा रहा है।

क्या है पैसेंजर पेरेंटिंग?

पैसेंजर पेरेंटिंग उस स्थिति को कहा जाता है, जिसमें माता या पिता में से केवल एक ही बच्चे की परवरिश की मुख्य जिम्मेदारी निभाता है, जबकि दूसरे की भूमिका बेहद सीमित होती है। इसकी तुलना गाड़ी में बैठे उस यात्री से की जाती है, जो सफर के दौरान केवल बैठकर रास्ता देखता है और सड़क की चुनौतियों का सामना ड्राइवर करता है।

आसान शब्दों में समझें तो घर में एक पेरेंट बच्चे की पढ़ाई, भावनात्मक जरूरतों और रोजमर्रा की जिम्मेदारियों पर ध्यान देता है, जबकि दूसरा केवल सीमित सवालों तक अपनी भूमिका रखता है। मसलन, एक पेरेंट पूछता है कि बच्चे ने कितना पढ़ा, जबकि दूसरा सिर्फ यह जानने में दिलचस्पी लेता है कि परीक्षा में कितने नंबर आए।

कई बार दोनों माता-पिता भी बच्चे की परवरिश में ‘पैसेंजर’ की भूमिका में नजर आते हैं, जिससे बच्चे को जरूरी मार्गदर्शन और भावनात्मक सहयोग पर्याप्त रूप से नहीं मिल पाता।

ज्यादातर मामलों में मां पर आ जाती है पूरी जिम्मेदारी

भारतीय समाज के नजरिए से देखें तो पैसेंजर पेरेंटिंग की स्थिति में अक्सर बच्चे की परवरिश की पूरी जिम्मेदारी मां पर आ जाती है। वहीं पिता शारीरिक रूप से मौजूद रहने के बावजूद कई बार अप्रत्यक्ष रूप से केवल आर्थिक मदद तक अपनी भूमिका सीमित रखता है।

ऐसे में बच्चे का भावनात्मक जुड़ाव एक ही पेरेंट के साथ ज्यादा हो सकता है, जबकि दूसरे पेरेंट के साथ मानसिक और भावनात्मक दूरी बढ़ती जाती है।

इसका असर उस पेरेंट पर भी पड़ता है, जो लगातार अकेले जिम्मेदारियां संभाल रहा होता है। उस पर बर्नआउट, तनाव, अकेलेपन और रिश्ते के प्रति कड़वाहट जैसी भावनाएं हावी हो सकती हैं।

बच्चों पर पड़ सकता है गहरा असर

पैसेंजर पेरेंटिंग का असर बच्चे के भावनात्मक विकास और रिश्तों को समझने के तरीके पर भी पड़ सकता है। इसके कई प्रभाव देखने को मिल सकते हैं।

  1. बच्चे की भावनात्मक जरूरतें पूरी नहीं हो पातीं, जिससे वह स्वस्थ और मजबूत भावनात्मक जुड़ाव बनाना ठीक से नहीं सीख पाता।
  2. बच्चा रिश्तों में संतुलन के महत्व को समझने में परेशानी महसूस कर सकता है और किसी एक पेरेंट से प्रभावित होकर उसी तरह का व्यवहार अपने रिश्तों में दोहरा सकता है।
  3. बच्चे का किसी एक पेरेंट पर जरूरत से ज्यादा निर्भर होने का खतरा रहता है।
  4. माता-पिता के साथ संवाद में कमी होने पर बच्चा अपनी परेशानियां और भावनाएं आसानी से साझा नहीं कर पाता।
  5. अगर दोनों ही पेरेंट्स बच्चे की जिंदगी में ‘पैसेंजर’ की भूमिका निभा रहे हों, तो उसे सही मार्गदर्शन न मिलने के कारण फैसले लेने में परेशानी हो सकती है।

 

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