8 साल की उम्र में आंखों की रोशनी हुई कम, फिर भी नहीं मानी हार! ऑटो ड्राइवर के बेटे अजय आर राज ने 5वें प्रयास में हासिल की UPSC में 109वीं रैंक
केरल: महज 8-9 साल की उम्र में आंखों की रोशनी कम होने के बाद भी अजय आर राज ने अपनी जिंदगी की मुश्किलों को अपनी मंजिल के रास्ते में नहीं आने दिया। आर्थिक तंगी के बीच ऑटो रिक्शा चलाने वाले पिता के बेटे अजय ने पढ़ाई को अपनी ताकत बनाया और दो बार UPSC सिविल सेवा परीक्षा पास की। पहली बार उन्हें 730वीं रैंक मिली, जबकि अपने पांचवें प्रयास में उन्होंने 109वीं ऑल इंडिया रैंक हासिल की।
8 साल की उम्र में बदली जिंदगी
अजय जब करीब 8-9 साल के थे, तब उनकी आंखों की रोशनी कम होने लगी। इस चुनौती के साथ मानसिक तनाव भी उनके जीवन का हिस्सा बना, लेकिन उन्होंने परिस्थितियों के सामने हार मानने के बजाय आगे बढ़ने का फैसला किया। धुंधली दृष्टि के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और मेहनत को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया।
अजय के पिता परिवार का खर्च चलाने के लिए ऑटो रिक्शा चलाते हैं, जबकि उनकी मां गृहणी हैं। आर्थिक मुश्किलों के बावजूद उनके पिता ने अजय की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी। अजय ने भी इस भरोसे को अपनी मेहनत के जरिए मजबूती दी।
स्टीफंस कॉलेज से पढ़ाई, फिर कॉलेज में पढ़ाया
अजय ने सीबीएसई की 12वीं कक्षा में अच्छा प्रदर्शन किया। इसके बाद उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से पढ़ाई की। आगे उन्होंने इंग्लिश लिटरेचर में मास्टर्स की डिग्री हासिल की और कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया।
पढ़ाने के साथ-साथ अजय ने सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी भी जारी रखी। शुरुआती प्रयासों में सफलता नहीं मिली, लेकिन उन्होंने अपनी तैयारी और लक्ष्य को नहीं छोड़ा।
पहली बार 730वीं रैंक, फिर 109वीं रैंक
अजय का लक्ष्य शुरू से ही सिविल सर्विसेज में जाना था। लगातार प्रयास करते हुए उन्होंने पहली बार UPSC परीक्षा पास की और 730वीं रैंक हासिल की। इस रैंक के आधार पर उनका चयन रेलवे सर्विस में हुआ।
हालांकि, अजय का लक्ष्य IAS बनना था। इसलिए उन्होंने दोबारा परीक्षा देने का फैसला किया। अपने पांचवें प्रयास में उन्होंने 109वीं ऑल इंडिया रैंक हासिल कर ली। इस तरह उन्होंने दूसरी बार UPSC सिविल सेवा परीक्षा पास की और अपने लक्ष्य के और करीब पहुंचे।
दृष्टिबाधा को नहीं मानते अपनी पहचान
अजय आर राज को खाली समय में उकुलेले बजाना और तैराकी करना पसंद है। उनका मानना है कि दृष्टिबाधा उनकी उपलब्धियों को न तो कम करती है और न ही उन्हें अलग तरीके से परिभाषित करती है। यह उनके जीवन का केवल एक हिस्सा है।
उनकी कहानी पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए संघर्ष, निरंतर प्रयास और लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता की मिसाल पेश करती है।
