‘दोनों माता-पिता IAS अफसर, फिर बच्चों को आरक्षण क्यों?’ सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी से छिड़ी नई बहस
नई दिल्ली: आरक्षण और क्रीमी लेयर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सुनवाई के दौरान अहम और सख्त टिप्पणी की। अदालत ने सवाल उठाया कि जब माता-पिता दोनों ही आईएएस अधिकारी हों और परिवार शैक्षिक व आर्थिक रूप से पूरी तरह सशक्त हो चुका हो, तब उनके बच्चों को आरक्षण की आवश्यकता क्यों होनी चाहिए। कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद आरक्षण व्यवस्था और क्रीमी लेयर के दायरे को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
पिछड़े वर्गों में क्रीमी लेयर को आरक्षण लाभ दिए जाने से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामाजिक और आर्थिक उन्नति के साथ सामाजिक गतिशीलता भी आती है। ऐसे में जिन परिवारों ने आरक्षण का लाभ लेकर एक निश्चित स्तर हासिल कर लिया है, उनकी अगली पीढ़ी को लगातार उसी सुविधा का लाभ मिलना चाहिए या नहीं, इस पर गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है।
कोर्ट ने आरक्षण की आवश्यकता पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट तौर पर कहा, “अगर दोनों माता-पिता आईएएस अधिकारी हैं, तो फिर आरक्षण की मांग क्यों की जा रही है?” कोर्ट ने कहा कि शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण समाज में स्थिति बदलने का माध्यम बनते हैं और इसका असर अगली पीढ़ी पर भी पड़ता है।
अदालत ने यह भी कहा कि कई सरकारी आदेशों में पहले से ही उन्नत वर्गों को आरक्षण के दायरे से बाहर रखने का प्रावधान मौजूद है, लेकिन अब इन्हीं बहिष्करणों को चुनौती दी जा रही है। कोर्ट ने संकेत दिए कि इस पूरे मुद्दे पर व्यापक दृष्टिकोण से विचार किए जाने की जरूरत है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कही बड़ी बात
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति नागरत्ना ने भी कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जिन छात्रों के माता-पिता अच्छी नौकरियों में हैं, बेहतर आय अर्जित कर रहे हैं और सामाजिक रूप से मजबूत स्थिति में पहुंच चुके हैं, उनके बच्चों द्वारा फिर से आरक्षण की मांग करना उचित नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में आरक्षण से बाहर किए जाने पर विचार होना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि सामाजिक गतिशीलता अब वास्तविकता बन चुकी है और आरक्षण का लाभ लेने वाले कई परिवार समाज में मजबूत स्थिति हासिल कर चुके हैं। ऐसे में यह तय करना जरूरी है कि आरक्षण का उद्देश्य वास्तव में किन लोगों तक पहुंचना चाहिए।
अगली पीढ़ी की पात्रता पर पुनर्विचार जरूरी: सुप्रीम कोर्ट
पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि जब कोई परिवार आरक्षण के जरिए शिक्षा और आर्थिक क्षेत्र में एक निश्चित स्तर तक पहुंच जाता है, तो अगली पीढ़ी की पात्रता का पुनर्मूल्यांकन होना चाहिए। अदालत ने कहा कि सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को ध्यान में रखना जरूरी है, लेकिन इसके साथ संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी ईडब्ल्यूएस आरक्षण और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को मिलने वाले आरक्षण के बीच अंतर का भी उल्लेख किया। अदालत ने संकेत दिए कि आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था और उसके प्रभावों पर व्यापक स्तर पर पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
