Chaurchan 2026: जिस चांद को देखने से लगता है कलंक, मिथिला में उसी की होती है पूजा; जानें चौरचन की पूरी कहानी और परंपरा

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मिथिला: बिहार के मिथिला क्षेत्र में चौरचन एक प्रमुख लोकपर्व के रूप में मनाया जाता है। इसे चौठ चंद्र, चौठचान और चौथ चंद्र के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। साल 2026 में चौरचन 14 सितंबर, सोमवार को मनाया जाएगा। इस दिन शाम के समय चंद्रमा की पूजा कर उन्हें अर्घ्य देने की परंपरा है।

क्यों की जाती है चंद्रमा की पूजा?

चौरचन पर्व की सबसे खास बात यह है कि जिस चतुर्थी के चंद्रमा को कई स्थानों पर देखने से बचने की मान्यता है, उसी चंद्रमा की मिथिला में पूजा की जाती है। इसके पीछे भगवान गणेश और चंद्रदेव से जुड़ी धार्मिक कथा बताई जाती है।

मान्यता के अनुसार, चंद्रमा को अपनी सुंदरता पर अभिमान हो गया था। इसी अहंकार में उन्होंने भगवान गणेश का मजाक उड़ाया। इससे नाराज होकर गणेशजी ने चंद्रमा को श्राप दिया कि उनकी सुंदरता और कांति कम हो जाएगी। साथ ही उन्होंने कहा कि भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को जो व्यक्ति चंद्रमा के दर्शन करेगा, उस पर झूठे आरोप और कलंक लग सकता है।

इसके बाद चंद्रदेव को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने गणेशजी को प्रसन्न करने के लिए चतुर्थी तिथि पर पूजा-आराधना की। गणेशजी ने प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया कि जो व्यक्ति गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा के दर्शन कर उनकी पूजा करेगा, उसका जीवन कलंक से मुक्त रहेगा। इसी मान्यता से चौरचन पर्व में चंद्रमा की पूजा की परंपरा जुड़ी मानी जाती है।

2026 में कब मनाया जाएगा चौरचन?

साल 2026 में चौरचन का पर्व 14 सितंबर, सोमवार को मनाया जाएगा। चतुर्थी तिथि 14 सितंबर की सुबह शुरू होकर 15 सितंबर की सुबह तक रहेगी। चूंकि चौरचन की पूजा शाम को चंद्रमा के दर्शन के बाद की जाती है, इसलिए यह पर्व 14 सितंबर को ही मनाया जाएगा।

आंगन में बनाया जाता है खास अरिपन

चौरचन की तैयारी घरों में सुबह से ही शुरू हो जाती है। शाम की पूजा के लिए आंगन या छत की सफाई की जाती है। इसके बाद पिठार यानी चावल के घोल से अरिपन बनाया जाता है। यह रंगोली जैसा होता है, लेकिन इसमें मुख्य रूप से सफेद रंग का इस्तेमाल किया जाता है।

अरिपन में चंद्रमा की आकृति और पारंपरिक डिजाइन बनाए जाते हैं। पूजा स्थल पर केले के पत्ते और दूसरी जरूरी पूजा सामग्री भी सजाई जाती है।

पूजा में चढ़ाए जाते हैं पारंपरिक पकवान और फल

चौरचन की पूजा में कई तरह के पारंपरिक पकवान, फल और मिठाइयां चढ़ाई जाती हैं। इसमें पूरी-सब्जी, अनरसा, पायस यानी खीर और दही जैसी चीजें शामिल होती हैं। दही और केला इस पूजा में विशेष महत्व रखते हैं।

परिवार के सदस्यों के हिसाब से अलग-अलग डलिया में पूजा की सामग्री तैयार करने की भी परंपरा है। इसमें फल, पकवान और अन्य प्रसाद को व्यवस्थित तरीके से रखा जाता है।

शाम को चंद्रमा को दिया जाता है अर्घ्य

दिनभर व्रत रखने के बाद शाम को महिलाएं चंद्रमा के दर्शन करती हैं और उन्हें अर्घ्य देकर पूजा करती हैं। परिवार के सदस्य भी हाथ में फल या पूजा की सामग्री लेकर चंद्रमा का दर्शन करते हैं।

कुछ परंपराओं में चंद्र दर्शन के समय स्यामंतक मणि से जुड़ा मंत्र पढ़ने और उसकी कथा सुनने की भी मान्यता है। मिथिला में चौरचन केवल चंद्रमा की पूजा का पर्व नहीं, बल्कि यहां की पारंपरिक संस्कृति और लोक आस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण त्योहार माना जाता है।

 

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