मलक्का में भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक चाल! सबांग पोर्ट से हिंद महासागर में बढ़ेगी ताकत, चीन की समुद्री रणनीति को मिल सकती है बड़ी चुनौती
नई दिल्ली: होर्मुज जलडमरूमध्य में हाल के घटनाक्रमों ने पूरी दुनिया को यह दिखा दिया कि किसी एक रणनीतिक समुद्री मार्ग पर संकट का वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार पर कितना बड़ा असर पड़ सकता है। अब भारत और इंडोनेशिया हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी रणनीतिक साझेदारी को नई ऊंचाई देने जा रहे हैं। दोनों देशों ने इंडोनेशिया के सबांग पोर्ट के संयुक्त विकास पर सहमति बनाई है। यह बंदरगाह मलक्का जलडमरूमध्य के प्रवेश द्वार पर स्थित है और भारत के ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से करीब 100 मील की दूरी पर होने के कारण इसे बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के साथ इस परियोजना पर समझौता हुआ। इसके तहत सबांग बंदरगाह को आधुनिक सुविधाओं से विकसित किया जाएगा और समुद्री सहयोग को नई मजबूती मिलेगी।
मलक्का जलडमरूमध्य क्यों है दुनिया का सबसे अहम समुद्री मार्ग
मलक्का जलडमरूमध्य हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर से जोड़ने वाला दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में शामिल है। चेन्नई से समुद्री मार्ग के जरिए बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर पार करने के बाद जहाज इसी जलडमरूमध्य से होकर पूर्वी एशिया की ओर बढ़ते हैं।
आज दुनिया के लगभग 25 प्रतिशत वैश्विक व्यापार की आवाजाही इसी समुद्री मार्ग से होती है। तेल, प्राकृतिक गैस, कोयला, पाम ऑयल, कंटेनर और अन्य महत्वपूर्ण वस्तुओं का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। हर वर्ष लगभग 2.8 ट्रिलियन डॉलर मूल्य का व्यापार इस जलडमरूमध्य से होकर होता है, जिससे इसकी वैश्विक रणनीतिक और आर्थिक अहमियत का अंदाजा लगाया जा सकता है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है सबांग पोर्ट
सबांग पोर्ट मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी प्रवेश द्वार पर स्थित है। यहां से भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का इंदिरा प्वाइंट लगभग 100 मील दूर है। भारत के पूर्वी एशिया के देशों जैसे जापान, दक्षिण कोरिया और चीन के साथ होने वाले व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है।
इसके अलावा भारत के पेट्रोलियम उत्पाद, कोयला, मशीनरी और कंटेनर परिवहन के लिए भी यह समुद्री मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ के तहत दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ संपर्क मजबूत करने में भी इसकी अहम भूमिका मानी जाती है।
ग्रेट निकोबार और सबांग मिलकर बनाएंगे नई रणनीतिक श्रृंखला
भारत पहले से अंडमान-निकोबार में ग्रेट निकोबार परियोजना पर तेजी से काम कर रहा है। इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत अंतरराष्ट्रीय ट्रांस-शिपमेंट पोर्ट, ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट, बिजली संयंत्र और आधुनिक टाउनशिप विकसित की जा रही है, ताकि भारत मलक्का जलडमरूमध्य के निकट एक प्रमुख समुद्री और लॉजिस्टिक्स हब के रूप में उभर सके।
अब सबांग पोर्ट के विकास के साथ यह परियोजना और अधिक रणनीतिक महत्व हासिल कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रेट निकोबार और सबांग परियोजनाओं का संयुक्त प्रभाव भारत को मलक्का जलडमरूमध्य के दोनों ओर मजबूत रणनीतिक पहुंच उपलब्ध करा सकता है।
चीन की ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी बेहद अहम है मलक्का मार्ग
मलक्का जलडमरूमध्य चीन की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा की प्रमुख समुद्री जीवनरेखा माना जाता है। पश्चिम एशिया और अफ्रीका से चीन पहुंचने वाले आयातित तेल और प्राकृतिक गैस का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। इसके अलावा चीन के निर्यात आधारित व्यापार की भी बड़ी निर्भरता इसी समुद्री रास्ते पर है।
वर्ष 2003 में तत्कालीन चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ ने ‘मलक्का दुविधा’ का उल्लेख करते हुए कहा था कि यदि किसी युद्ध या संकट के कारण यह मार्ग बाधित हो गया तो चीन की ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
2018 की पहल को अब मिली नई रफ्तार
भारत और इंडोनेशिया के बीच वर्ष 2018 में भी सबांग पोर्ट पर सहयोग की रूपरेखा तैयार की गई थी। अब बदलते इंडो-पैसिफिक परिदृश्य और दोनों देशों के मजबूत होते संबंधों के बीच इस परियोजना को नई गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
सबांग पोर्ट इंडोनेशिया के आचेह प्रांत में स्थित है और यहां से गुजरने वाले जहाजों की गतिविधियों पर निगरानी रखना अपेक्षाकृत आसान माना जाता है। यही वजह है कि यह परियोजना केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि समुद्री सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति के बीच भारत की मजबूत तैयारी
पिछले एक दशक में चीन ने ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ और ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति के तहत हिंद महासागर क्षेत्र में कई बंदरगाहों और समुद्री परियोजनाओं में निवेश किया है। पाकिस्तान का ग्वादर, श्रीलंका का हम्बनटोटा और म्यांमार का क्याउकफ्यू बंदरगाह इसी रणनीति का हिस्सा माने जाते हैं।
ऐसे में सबांग पोर्ट और ग्रेट निकोबार परियोजना भारत को क्षेत्रीय संतुलन मजबूत करने, समुद्री हितों की सुरक्षा बढ़ाने और हिंद महासागर तथा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी रणनीतिक मौजूदगी को और प्रभावी बनाने का अवसर दे सकती है।
भारत और इंडोनेशिया दोनों ही मुक्त, सुरक्षित और नियम-आधारित इंडो-पैसिफिक व्यवस्था के समर्थक हैं। ऐसे में समुद्री व्यापार, आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा और नौवहन की स्वतंत्रता जैसे साझा हितों को आगे बढ़ाने में यह साझेदारी आने वाले वर्षों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
