भारत पर मंडरा रहा ‘सुपर अल नीनो’ का खतरा! कमजोर मानसून के बाद बढ़ सकती है पानी की किल्लत, रबी फसलों और 2027 की गर्मी पर भी असर

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नई दिल्ली: भारत में इस साल सामान्य से करीब 13 प्रतिशत कम बारिश दर्ज होने के बाद अब जल संकट और आने वाले मौसम को लेकर चिंता बढ़ गई है। प्रशांत महासागर में अल नीनो के और मजबूत होने की आशंका के बीच वैज्ञानिकों ने सर्दियों में सामान्य से अधिक तापमान, पहाड़ी इलाकों में कम बर्फबारी और 2027 की गर्मियों में भीषण गर्मी की संभावनाओं पर ध्यान दिलाया है। इसका असर जलाशयों में पानी की उपलब्धता, पेयजल आपूर्ति, सिंचाई और रबी फसलों पर पड़ सकता है। हालांकि, अगले मानसून में बारिश कितनी होगी, इसका अभी निश्चित अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

क्या है सुपर अल नीनो, क्यों बढ़ रही है चिंता?

अल नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक होने से जुड़ी जलवायु घटना है। इसके कारण वायुमंडलीय परिस्थितियों में बदलाव आता है, जिससे दुनिया के कई हिस्सों में बारिश और तापमान का स्वरूप प्रभावित हो सकता है। भारत में भी इसका असर मानसून और सर्दियों के मौसम पर पड़ने की आशंका रहती है।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अक्टूबर के पूर्वानुमान के मुताबिक, प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक हो सकता है। यदि यह स्थिति असाधारण रूप से मजबूत होती है, तो इसे सुपर अल नीनो कहा जा सकता है। हालांकि, सुपर अल नीनो कोई आधिकारिक मौसम श्रेणी नहीं है और इसकी संभावित तीव्रता को लेकर अभी अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

कम बारिश से जलाशयों और भूजल पर बढ़ सकता है दबाव

मानसून में कम बारिश होने का असर जलाशयों, भूजल स्तर और मिट्टी में मौजूद नमी पर पड़ सकता है। यदि सर्दियों के दौरान भी पर्याप्त बारिश नहीं होती और तापमान सामान्य से अधिक रहता है, तो आने वाले महीनों में पेयजल और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता चुनौती बन सकती है।

महाराष्ट्र में जल भंडारों की स्थिति को देखते हुए पानी की आपूर्ति में कटौती जैसे कदमों की खबरें सामने आई हैं। ऐसे हालात में राज्यों और स्थानीय प्रशासन के लिए उपलब्ध जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करना महत्वपूर्ण होगा। हालांकि, पानी की कमी का असर हर क्षेत्र में एक जैसा नहीं होगा। यह स्थानीय बारिश, जलाशयों में भंडारण और भूजल की स्थिति पर भी निर्भर करेगा।

रबी फसलों पर भी पड़ सकता है मौसम की मार का असर

अल नीनो और कमजोर मानसून का असर रबी सीजन की खेती के लिए भी चिंता बढ़ा रहा है। गेहूं, सरसों और चना जैसी सर्दियों में उगाई जाने वाली फसलों की बढ़वार और पैदावार पर तापमान तथा पानी की उपलब्धता का सीधा प्रभाव पड़ सकता है। यदि सर्दियों में तापमान सामान्य से अधिक रहता है, तो फसलों की पानी की जरूरत बढ़ सकती है। वहीं, सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिलने पर किसानों को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

खासतौर पर उन क्षेत्रों में जोखिम अधिक हो सकता है जहां खेती बारिश पर निर्भर है या सिंचाई के सीमित साधन उपलब्ध हैं। ऐसे में मिट्टी की नमी बनाए रखना, पानी का सावधानी से इस्तेमाल करना और फसलों की जरूरत के अनुसार सिंचाई की योजना बनाना महत्वपूर्ण होगा।

पहाड़ी क्षेत्रों में कम बर्फबारी से जल स्रोतों पर असर की आशंका

सर्दियों में तापमान अधिक रहने से पहाड़ी इलाकों में बर्फबारी कम होने की आशंका भी जताई जा रही है। कई नदियों और जल स्रोतों को बर्फ पिघलने से पानी मिलता है। ऐसे में बर्फबारी में कमी आने पर भविष्य में इन जल स्रोतों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इसका असर कुछ क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति और सिंचाई पर भी पड़ सकता है। हालांकि, वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि सर्दियों में तापमान और बर्फबारी की स्थिति कैसी रहती है।

2027 में लू और भीषण गर्मी का खतरा, अगले मानसून पर भी नजर

यदि अल नीनो का प्रभाव 2027 की गर्मियों तक बना रहता है, तो तापमान बढ़ने और लू चलने का खतरा बढ़ सकता है। भीषण गर्मी के कारण बिजली की मांग बढ़ने के साथ स्वास्थ्य सेवाओं और खाद्य आपूर्ति पर भी दबाव पड़ने की आशंका है। ऐसे में गर्मी से बचाव, पानी का संरक्षण और बिजली की मांग को ध्यान में रखकर समय रहते तैयारी करना जरूरी होगा।

अगले साल के मानसून को लेकर भी मौसम की परिस्थितियों पर नजर रखी जा रही है। हालांकि, केवल अल नीनो के आधार पर यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि 2027 में बारिश कम ही होगी। हिंद महासागर की परिस्थितियां और अन्य मौसमी प्रणालियां भी मानसून को प्रभावित करती हैं। इसलिए आने वाले महीनों के मौसम पूर्वानुमान और जल संसाधनों की स्थिति पर लगातार नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।

 

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