नेपाल में चुनाव से पहले सियासी उबाल: राजशाही की बहाली को लेकर काठमांडू की सड़कों पर नारे, बढ़ा तनाव
नेपाल में एक बार फिर सियासी माहौल गर्म हो गया है। संसदीय चुनाव से महज 53–54 दिन पहले राजधानी काठमांडू की सड़कों पर राजशाही समर्थक उतर आए और पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह के समर्थन में जमकर नारेबाजी की। राजवंश के समर्थकों ने रैली निकालकर राजशाही की बहाली की मांग की, जिससे अंतरिम सरकार की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं।
काठमांडू में राजशाही समर्थकों की बड़ी रैली
यह प्रदर्शन पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह के समर्थकों की ओर से सितंबर में हुए हिंसक युवा आंदोलनों के बाद पहली बड़ी रैली मानी जा रही है। राजधानी काठमांडू में पृथ्वी नारायण शाह की प्रतिमा के आसपास बड़ी संख्या में लोग जुटे और ‘हमें अपना राजा चाहिए’ व ‘राजा को वापस लाओ’ जैसे नारे लगाए। मार्च में होने वाले संसदीय चुनाव से ठीक पहले हुए इस प्रदर्शन ने राजनीतिक हलकों में हलचल तेज कर दी है।
सितंबर के आंदोलन के बाद पहली बड़ी शक्ति-प्रदर्शन
सितंबर में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और खराब शासन के खिलाफ हुए जनाक्रोश और हिंसक प्रदर्शनों के बाद नेपाल में अंतरिम सरकार का गठन किया गया था। उसी सरकार ने मार्च में नए चुनाव कराने की घोषणा की थी। मौजूदा रैली को उसी राजनीतिक अस्थिरता की अगली कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।
2008 में खत्म हुई थी राजशाही
नेपाल में वर्ष 2008 में राजशाही का अंत कर देश को गणराज्य घोषित किया गया था। शाह वंश के अंतिम राजा ज्ञानेंद्र शाह को सत्ता छोड़नी पड़ी थी। रैली में शामिल सम्राट थापा समेत कई वक्ताओं ने कहा कि मौजूदा हालात में देश के लिए राजशाही ही आखिरी और एकमात्र विकल्प है। उनका दावा है कि जेन जी आंदोलनों के बाद नेपाल जिस दिशा में जा रहा है, उसे संभालने के लिए राजशाही की जरूरत है।
पहले भी हो चुकी हैं हिंसक घटनाएं
पृथ्वी नारायण शाह की जयंती पर निकाली जाने वाली रैलियां पहले भी हिंसक हो चुकी हैं। पिछले साल मार्च में हुई एक राजशाही समर्थक रैली के दौरान दो लोगों की मौत हो गई थी। हालांकि इस बार प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा और दंगा नियंत्रण पुलिस ने कड़ी निगरानी रखी।
2026 की शुरुआत फिर आंदोलनों से
नेपाल का शाही परिवार आज भी समाज के एक बड़े वर्ग, खासकर ग्रामीण इलाकों और पारंपरिक सोच वाले तबकों में समर्थन रखता है। फिलहाल अंतरिम सरकार का नेतृत्व देश की पहली महिला प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त जज सुशीला कार्की कर रही हैं। जेन जी आंदोलनों के बाद सत्ता में आईं कार्की सरकार पर भ्रष्टाचार मामलों में सख्ती न दिखाने के आरोप भी लग रहे हैं। ऐसे में चुनाव से पहले राजशाही की वापसी की मांग ने नेपाल की राजनीति को एक बार फिर दो ध्रुवों में बांटना शुरू कर दिया है।
