लखनऊ की ऐतिहासिक धरती: यहीं पहली बार फहराया गया था तिरंगा, अंग्रेजी हुकूमत को मिली खुली चुनौती
लखनऊ। तहजीब, नजाकत और नफासत के लिए दुनिया भर में पहचाना जाने वाला शहरे-ए-लखनऊ केवल सांस्कृतिक राजधानी ही नहीं, बल्कि आज़ादी की लड़ाई का भी एक अहम केंद्र रहा है। बागों, शफूगों और ऐतिहासिक स्मारकों के शहर के रूप में मशहूर लखनऊ की धरती ने स्वतंत्रता आंदोलन में वह भूमिका निभाई, जिसे इतिहास कभी भुला नहीं सकता। अमीनाबाद स्थित अमीनुद्दौला पार्क, जिसे आज पूरा शहर ‘झंडे वाला पार्क’ के नाम से जानता है, उसी गौरवशाली संघर्ष का साक्षी है।
क्यों कहलाया अमीनुद्दौला पार्क ‘झंडे वाला पार्क’
जनवरी 1928 में अंग्रेजी हुकूमत को सीधी चुनौती देते हुए क्रांतिकारियों ने पहली बार राष्ट्रीय ध्वज अमीनुद्दौला पार्क में फहराया था। यही वह ऐतिहासिक क्षण था, जब इस पार्क को ‘झंडे वाला पार्क’ की पहचान मिली। इसके बाद से यह स्थान आज़ादी के आंदोलन का प्रतीक बन गया।
इमदाद बाग से अमीनुद्दौला पार्क तक का सफर
अवध के चौथे बादशाह अमजद अली शाह के शासनकाल में उनके वज़ीर इमदाद हुसैन खां अमीनुद्दौला को यह क्षेत्र मिला था। उस समय इसे ‘इमदाद बाग’ कहा जाता था। ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1914 में अमीनाबाद का पुनर्निर्माण कराया गया, चारों ओर सड़कें बनीं और बीच में बचे स्थान पर एक पार्क विकसित किया गया, जिसे अमीनुद्दौला पार्क नाम दिया गया।
आजादी के मतवालों ने बदल दी पहचान
हालांकि, पार्क को असली पहचान तब मिली जब आज़ादी के दीवानों ने यहां पहली बार तिरंगा फहराया। इसके बाद से अमीनुद्दौला पार्क आम लोगों की ज़ुबान पर ‘झंडे वाला पार्क’ के नाम से बस गया और यह स्थान स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बन गया।
नमक कानून तोड़ने से लेकर तिरंगा फहराने तक
18 अप्रैल 1930 को इसी पार्क से जुड़े आंदोलन के तहत क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश हुकूमत के नमक कानून को तोड़ते हुए नमक बनाया। यह घटना लखनऊ में सविनय अवज्ञा आंदोलन की एक अहम कड़ी मानी जाती है।
शहादत की अमर गाथा: गुलाब सिंह लोधी
अगस्त 1935 में क्रांतिकारी गुलाब सिंह लोधी उस जुलूस में शामिल हुए, जिसका उद्देश्य पार्क में तिरंगा फहराना था। झंडारोहण से पहले ही अंग्रेजी सैनिकों ने पूरे पार्क को घेर लिया, लेकिन गुलाब सिंह लोधी ने डर को परे रखकर पार्क में प्रवेश किया और एक पेड़ पर चढ़कर राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया। इसी दौरान अंग्रेजी सैनिकों ने उन पर गोलियां चला दीं और वे वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी शहादत ने झंडे वाले पार्क को आज़ादी की अमर पहचान दे दी।
