22 साल पुराने मर्डर केस में बड़ा फैसला: ‘मारो साले को’ कहना हत्या की साजिश नहीं, दिल्ली हाई कोर्ट ने उम्रकैद दोषी को किया बरी

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नई दिल्ली: 22 साल पुराने हत्या मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी झगड़े के दौरान केवल ‘मारो साले को’ कह देना हत्या के साझा इरादे का पर्याप्त प्रमाण नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे शब्दों का अर्थ केवल मारपीट या चोट पहुंचाने का इरादा भी हो सकता है, इसलिए इन्हें सीधे हत्या की मंशा से नहीं जोड़ा जा सकता।

उम्रकैद की सजा को हाई कोर्ट ने किया रद्द

न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर डुडेजा की खंडपीठ ने अपीलकर्ता मुकेश कुमार की याचिका स्वीकार करते हुए उसे संदेह का लाभ दिया और बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि मुकेश कुमार को घटना में इस्तेमाल किए गए हथियारों की जानकारी थी या उसने अन्य आरोपियों के साथ मिलकर कोई पूर्व नियोजित योजना बनाई थी।

बस में छेड़छाड़ के विरोध से शुरू हुआ था विवाद

मामला 1 दिसंबर 1983 का है, जब रूट नंबर 431 की डीटीसी बस में कुछ युवकों द्वारा महिला यात्रियों के साथ कथित बदसलूकी किए जाने का विरोध किया गया था। विरोध करने वाले विनोद कुमार और उनके साथियों का आरोपियों से विवाद हो गया, जो बाद में हिंसक झड़प में बदल गया।

चाकू हमले में गई थी युवक की जान

अभियोजन के अनुसार झगड़े के दौरान सह-आरोपी बलविंदर सिंह ने विनोद कुमार पर चाकू से हमला किया था। गंभीर चोटों के चलते बाद में विनोद की मौत हो गई। इसी घटना के बाद पुलिस ने मुकेश कुमार सहित चार लोगों को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था।

‘मारो साले को’ कहने पर बनाया गया था आरोपी

पुलिस और अभियोजन पक्ष का दावा था कि बस के पिछले हिस्से में खड़े मुकेश कुमार ने ‘मारो साले को’ कहकर अन्य आरोपियों को उकसाया था। इसी आधार पर उसे हत्या के मामले में सह-आरोपी बनाया गया और वर्ष 2004 में ट्रायल कोर्ट ने उसे दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

हाई कोर्ट बोला- हत्या की मंशा साबित नहीं हुई

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ‘मारो’ शब्द का अर्थ हर स्थिति में ‘जान से मारना’ नहीं होता। यह केवल पीटने या चोट पहुंचाने के संदर्भ में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। अदालत ने माना कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि मुकेश कुमार हत्या की योजना या इरादे का हिस्सा था।

साक्ष्यों के अभाव में मिला संदेह का लाभ

पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि अपीलकर्ता को अन्य आरोपियों के पास चाकू होने की जानकारी थी या उसने किसी आपराधिक साजिश में सक्रिय भूमिका निभाई थी। ऐसे में आपराधिक न्याय प्रणाली के सिद्धांतों के तहत उसे संदेह का लाभ दिया जाना आवश्यक है।

 

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