इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: किरायेदारी के सिविल विवाद में नहीं लगेगा SC/ST एक्ट, समन और चार्जशीट रद्द
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुलंदशहर से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि मूल रूप से दीवानी (सिविल) प्रकृति के विवादों को व्यक्तिगत रंजिश निकालने के लिए आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को प्रताड़ित करने या दबाव बनाने के लिए करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। इसी आधार पर अदालत ने एससी/एसटी एक्ट के तहत जारी समन आदेश और चार्जशीट को रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दीवानी या किरायेदारी के विवाद को आपराधिक रंग देकर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज कराना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा। अदालत ने कहा कि इस अधिनियम की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत अपराध तभी माना जाएगा, जब कथित घटना सार्वजनिक दृष्टि (पब्लिक व्यू) में हुई हो और उसका उद्देश्य केवल पीड़ित को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करना हो।
विशेष अदालत का आदेश किया रद्द
जस्टिस संतोष राय की एकल पीठ ने ललित कुमार उर्फ ललित आर्य की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए बुलंदशहर की विशेष अदालत द्वारा एससी/एसटी एक्ट के तहत जारी समन आदेश और उनके खिलाफ दाखिल चार्जशीट को पूरी तरह रद्द कर दिया।
क्या था पूरा मामला?
मामला बुलंदशहर जिले के खुर्जा नगर थाना क्षेत्र का है। आर्य समाज मंदिर परिसर के पास स्थित एक दुकान को लेकर विवाद चल रहा था। शिकायतकर्ता मंदिर परिसर में किरायेदार था, जबकि ललित कुमार उर्फ ललित आर्य मंदिर में कैशियर के रूप में कार्यरत थे।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि 12 मार्च 2023 को ललित कुमार और उनके साथ आए अन्य लोगों ने उसकी दुकान पर पहुंचकर मारपीट की और जातिसूचक शब्द कहकर उसका अपमान किया। इस कथित घटना के एक वर्ष से अधिक समय बाद, 9 अप्रैल 2024 को एफआईआर दर्ज कराई गई। एफआईआर में पांच नामजद और कुछ अज्ञात लोगों को आरोपी बनाया गया था, लेकिन पुलिस जांच के बाद केवल ललित कुमार के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। इसके आधार पर विशेष अदालत ने 8 जुलाई 2024 को समन जारी किया था, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
एफआईआर में देरी पर भी उठाए सवाल
अपीलकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि कथित घटना के एक वर्ष से अधिक समय बाद एफआईआर दर्ज कराई गई और इतनी देरी का कोई संतोषजनक कारण नहीं बताया गया। साथ ही यह भी कहा गया कि दोनों पक्षों के बीच पहले से किरायेदारी को लेकर विवाद चल रहा था और इसी रंजिश के कारण झूठा मुकदमा दर्ज कराया गया।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि पीड़ित के बयान और जांच के दौरान मिले साक्ष्यों के आधार पर प्रथम दृष्टया अपराध बनता है, इसलिए केवल एफआईआर में देरी या अन्य आरोपियों के नाम हट जाने से मामला खारिज नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष एफआईआर में हुई एक वर्ष की देरी का संतोषजनक कारण नहीं बता सका। अदालत ने यह भी माना कि दोनों पक्षों के बीच पहले से किरायेदारी का दीवानी विवाद चल रहा था।
फैसले में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) तभी लागू होगी, जब घटना सार्वजनिक स्थान पर हुई हो और उसका उद्देश्य केवल जाति के आधार पर अपमानित करना हो। साधारण झगड़े या किरायेदारी जैसे दीवानी विवाद को जातीय अपमान का रूप देकर आपराधिक मुकदमा चलाना कानून का दुरुपयोग है।
