भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर जल्द लग सकती है मुहर, अंतिम चरण में पहुंची बातचीत, जानिए समझौते में देरी की बड़ी वजह
नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से प्रस्तावित बहुप्रतीक्षित ट्रेड डील अब अपने अंतिम चरण में पहुंच गई है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, समझौते की प्रमुख शर्तों पर दोनों पक्षों के बीच सहमति बन चुकी है और दस्तावेज भी तैयार हैं। यदि प्रक्रिया तय समय के अनुसार आगे बढ़ती है तो अगले तीन से चार महीनों के भीतर इस महत्वपूर्ण व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए जा सकते हैं।
क्यों अटकी हुई है ट्रेड डील?
मनीला में आयोजित आसियान विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान एक अमेरिकी अधिकारी ने बताया कि समझौते में देरी की सबसे बड़ी वजह अमेरिका की सेक्शन 301 के तहत जारी व्यापारिक जांच है। भारत समेत करीब 60 देशों से जुड़े इस मामले की जांच फिलहाल चल रही है और इसके नतीजे अगले दो से तीन सप्ताह में आने की संभावना है। जांच पूरी होने के बाद अमेरिका विभिन्न देशों के साथ लंबित व्यापार समझौतों की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगा।
क्या है सेक्शन 301?
अमेरिका के ट्रेड एक्ट, 1974 के तहत सेक्शन 301 अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि को यह अधिकार देता है कि वह किसी भी देश की व्यापारिक नीतियों की समीक्षा कर सके। यदि जांच के दौरान अमेरिकी कंपनियों के साथ अनुचित या भेदभावपूर्ण व्यवहार सामने आता है तो अमेरिका संबंधित देश पर अतिरिक्त शुल्क लगाने, व्यापारिक प्रतिबंध लागू करने या अन्य कार्रवाई करने का अधिकार रखता है।
हाल के दिनों में अमेरिका इसी प्रावधान के तहत ब्राजील और कनाडा पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा भी कर चुका है। ऐसे में माना जा रहा है कि भारत के साथ चल रही व्यापार वार्ता में भी इस प्रावधान का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है।
टैरिफ विवाद बना सबसे बड़ी चुनौती
ट्रेड डील पर बातचीत के समानांतर अमेरिका ने कई देशों पर नए टैरिफ लगाने की नीति भी अपनाई है। वहीं, जेनेरिक दवाओं पर चरणबद्ध तरीके से 200 प्रतिशत तक शुल्क लगाने की घोषणा ने भी नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। प्रस्ताव के मुताबिक पहले दो वर्षों तक राहत दी जाएगी, इसके बाद एक वर्ष के लिए 100 प्रतिशत और फिर 200 प्रतिशत तक टैरिफ लागू किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की टैरिफ नीति और सेक्शन 301 के तहत जारी जांच भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में देरी की प्रमुख वजह रही है। हालांकि भारत पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि वह केवल उन्हीं व्यापारिक समझौतों पर सहमति देगा जो देश के आर्थिक हितों के अनुरूप होंगे।
