शनिदेव राजा को रंक और रंक को राजा बना देते हैं, लेकिन हनुमान जी और भोलेनाथ के भक्तों पर क्यों नहीं पड़ती उनकी वक्र दृष्टि?
नई दिल्ली। हिंदू धर्म में शनिदेव को कर्मफल दाता और न्याय का देवता माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र में भी शनि ग्रह का विशेष महत्व है, जो हर ढाई साल में एक राशि से दूसरी राशि में गोचर करता है और व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल या दंड देता है। शनिवार का दिन शनिदेव को समर्पित है और इस दिन उनकी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
क्यों डरते हैं लोग शनिदेव के नाम से
शनिदेव का नाम सुनते ही अधिकतर लोग भयभीत हो जाते हैं। मान्यता है कि यदि शनिदेव प्रसन्न हों तो रंक को राजा बना देते हैं, लेकिन अगर उनकी वक्र यानी टेढ़ी दृष्टि किसी पर पड़ जाए तो जीवन कष्टों से भर जाता है। हालांकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हनुमान जी और भगवान शिव के भक्तों पर शनिदेव की यह टेढ़ी दृष्टि असर नहीं करती। इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं।
हनुमान जी ने शनिदेव को रावण की कैद से दिलाई थी मुक्ति
पौराणिक कथा के अनुसार, जब हनुमान जी माता सीता की खोज में लंका पहुंचे थे, तब उन्होंने देखा कि रावण ने शनिदेव को कारागार में बंदी बनाकर रखा है। हनुमान जी ने उन्हें रावण की कैद से मुक्त कराया। इस पर प्रसन्न होकर शनिदेव ने बजरंगबली को वरदान दिया कि जो भी उनकी आराधना करेगा, उसे वे कभी कष्ट नहीं देंगे। यही वजह है कि साढ़ेसाती और ढैय्या के दौरान हनुमान जी की पूजा करने की सलाह दी जाती है।
हनुमान जी के तप में विघ्न डालना पड़ा शनिदेव को भारी
एक अन्य कथा के अनुसार, अहंकार में डूबे शनिदेव ने हनुमान जी के जप और तप में बाधा डालने का प्रयास किया। उन्होंने अपनी शक्ति का भय दिखाकर उनका ध्यान भंग करने की कोशिश की, लेकिन हनुमान जी पर इसका कोई असर नहीं हुआ। क्रोधित होकर शनिदेव ने उन्हें चुनौती दे दी। जब शनिदेव ने हनुमान जी की बांह पकड़ ली, तो बजरंगबली ने उन्हें अपनी पूंछ में लपेट लिया।
पत्थरों पर पटकने के बाद मांगी शनिदेव ने क्षमा
कथा के अनुसार, हनुमान जी ने क्रोध में शनिदेव को पत्थरों पर पटकना शुरू कर दिया। अंत में शनिदेव ने बजरंगबली से क्षमा मांगी। तब हनुमान जी ने कहा कि भविष्य में न तो ऐसी उद्दंडता करें और न ही उनके भक्तों को सताएं। तभी से मान्यता है कि हनुमान जी के भक्तों पर शनिदेव अपनी वक्र दृष्टि नहीं डालते।
भगवान शिव से जुड़ी है दूसरी बड़ी मान्यता
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव ने शनिदेव को कर्म दंडाधिकारी का पद दिया था, जबकि सूर्यदेव ने उन्हें विभिन्न लोकों का अधिपत्य सौंपा। लेकिन बाद में शनिदेव ने अपने अधिकार से आगे बढ़कर अन्य लोकों पर भी अधिकार कर लिया। इस पर सूर्यदेव ने भगवान शिव से हस्तक्षेप की प्रार्थना की।
शिव से युद्ध और वक्र दृष्टि का अंत
कथा के अनुसार, भगवान शिव ने पहले अपने गणों को शनिदेव से युद्ध के लिए भेजा, लेकिन शनिदेव ने सभी को परास्त कर दिया। इसके बाद स्वयं महादेव युद्ध के लिए उतरे। युद्ध के दौरान शनिदेव ने शिव जी पर वक्र दृष्टि डाली, जिससे क्रोधित होकर महादेव ने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया। शिव जी के त्रिशूल प्रहार से शनिदेव संज्ञाशून्य हो गए और उन्हें 19 वर्षों तक पीपल के वृक्ष से उल्टा लटका दिया गया।
शिव भक्ति से बदली शनिदेव की दृष्टि
कहा जाता है कि इस दौरान शनिदेव लगातार भगवान शिव की आराधना करते रहे। इसी कारण यह मान्यता बनी कि भगवान शिव के भक्तों पर शनिदेव कभी अपनी टेढ़ी या वक्र दृष्टि नहीं डालते। यही वजह है कि शिव भक्त और हनुमान जी के उपासक शनि के प्रकोप से सुरक्षित माने जाते हैं।
