भगवान शिव के मस्तक पर क्यों विराजमान है चंद्रमा? जानिए इसके पीछे छिपी पौराणिक कथा और गहरा अर्थ

नई दिल्ली। भगवान शिव हिंदू धर्म के सबसे रहस्यमयी और गूढ़ देवताओं में माने जाते हैं। उनके हर स्वरूप, आभूषण और प्रतीक के पीछे एक गहरा आध्यात्मिक और पौराणिक अर्थ छिपा हुआ है। गले में लिपटा नाग, शरीर पर लगी भस्म और माथे पर सुशोभित चंद्रमा—ये सभी शिव तत्व उनके स्वरूप को विशेष बनाते हैं। ऐसे में यह प्रश्न अक्सर मन में उठता है कि आखिर भगवान शिव ने अपने मस्तक पर चंद्रमा को क्यों धारण किया।

उग्रता और शांति के संतुलन का प्रतीक है चंद्रमा

भगवान शिव को शंकर, महादेव और भोलेनाथ जैसे कई नामों से जाना जाता है। वे जितने सरल और करुणामय हैं, उतने ही रौद्र और उग्र भी। उनका तांडव रूप ऊर्जा और विनाश का प्रतीक है, जबकि चंद्रमा शांति, ठंडक और मन के संतुलन का संकेत देता है। शिव के मस्तक पर विराजमान चंद्रमा इसी उग्रता और शांति के संतुलन को दर्शाता है।

समुद्र मंथन से जुड़ी है चंद्रमा धारण करने की कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था। इस मंथन से 14 अनमोल रत्न प्राप्त हुए, लेकिन सबसे पहले जो वस्तु निकली वह था कालकूट नामक अत्यंत भयानक विष। इस विष की तीव्रता से पूरी सृष्टि पर संकट मंडराने लगा। इसकी गंध मात्र से ही देवता और असुर भयभीत हो उठे और कोई भी इसे ग्रहण करने का साहस नहीं कर पाया।

नीलकंठ बने शिव, लेकिन बढ़ गई शरीर की उष्णता

सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने कालकूट विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और तभी से वे नीलकंठ कहलाए। हालांकि विष को धारण करने के बाद उनके शरीर में अत्यधिक गर्मी उत्पन्न होने लगी, जिससे संतुलन बनाए रखना कठिन हो गया।

चंद्रदेव ने दी शिव को शीतलता

भगवान शिव के शरीर में बढ़ती उष्णता को शांत करने के लिए चंद्रदेव ने अपनी ठंडी किरणों से उन्हें शीतलता प्रदान की। चंद्रमा की शांति और ठंडक से शिव का शरीर संतुलित हुआ। इसी कारण भगवान शिव ने चंद्रमा को अपने मस्तक पर स्थान दिया और उसे सदा के लिए अपने साथ धारण कर लिया।

समय और मृत्यु से परे होने का संकेत

शिव के मस्तक पर विराजमान चंद्रमा यह भी दर्शाता है कि वे समय के बंधन से परे हैं। चंद्रमा समय और काल का प्रतीक माना जाता है, और उसका शिव के अधीन होना यह बताता है कि महादेव जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त, अनंत और अजन्मा हैं। इस तरह भगवान शिव का चंद्रमा धारण करना केवल एक अलंकरण नहीं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक और पौराणिक अर्थों से जुड़ा हुआ प्रतीक है।

 

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