पति के प्यार में जीरे से भी नफरत कर बैठीं राजस्थान की महिलाएं, ‘जीरो’ लोकगीत में छिपी है दर्द और चिंता की कहानी

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नई दिल्ली: भारतीय रसोई में जीरा स्वाद और खुशबू बढ़ाने वाला एक आम मसाला है, लेकिन राजस्थान के लोकजीवन में इसी जीरे को लेकर एक ऐसा लोकगीत प्रचलित है, जिसमें इसे जिंदगी का दुश्मन तक बताया गया है। इस गीत के जरिए ग्रामीण महिलाएं अपने पति के प्रति प्रेम के साथ-साथ खेती से जुड़े जोखिम और परिवार की चिंता भी जाहिर करती हैं।

राजस्थान में प्रचलित ‘जीरा’ या ‘जीरो’ लोकगीत उस दौर की ग्रामीण जिंदगी को सामने लाता है, जब जीरे की खेती किसानों के लिए किसी जुए से कम नहीं मानी जाती थी। फसल मौसम में मामूली बदलाव या देखभाल में थोड़ी सी चूक से भी खराब हो सकती थी। ऐसे में महिलाओं की चिंता केवल फसल को लेकर नहीं, बल्कि अपने पति की मेहनत, सेहत और परिवार की आर्थिक स्थिति को लेकर भी होती थी।

क्यों जीरे की खेती से परेशान थीं महिलाएं

पुराने समय में सिंचाई के पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं थे। जीरे का पौधा बेहद संवेदनशील होने के कारण किसानों को इसकी फसल की लगातार देखभाल करनी पड़ती थी। कड़ाके की ठंड में भी किसान रातभर जागकर फसल की निगरानी करते थे, ताकि मौसम या किसी अन्य वजह से पूरी मेहनत बर्बाद न हो जाए।

यही वजह थी कि लोकगीत में महिला अपने पति से जीरा न बोने की गुहार लगाती है। उसके लिए जीरा केवल एक फसल नहीं, बल्कि ऐसी मेहनत और जोखिम का प्रतीक था, जो उसके पति को शारीरिक और आर्थिक परेशानी में डाल सकता था।

‘मत बाओ म्हारा परण्या जीरो…’ में छिपा पति के लिए प्यार

लोकगीत की पंक्तियां, “मत बाओ म्हारा परण्या जीरो, यो जीरो जीव रो बेरी रे…” ग्रामीण महिला की भावनाओं को सामने लाती हैं। वह अपने पति को जीरे की खेती से दूर रहने के लिए कहती है, क्योंकि उसे इस फसल से जुड़े जोखिम का अंदाजा है।

गीत में महिला की चिंता पति की मेहनत, उसकी सेहत और परिवार की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ी दिखाई देती है। इस तरह जीरे को लेकर नाराजगी के पीछे असल भाव पति के प्रति प्रेम और उसकी सलामती की चिंता का है।

कीड़े और फसल खराब होने का भी डर

लोकगीत की एक अन्य पंक्ति में जीरे की फसल में कीड़े लगने की आशंका का जिक्र मिलता है। जीरे के पौधे में कीट लगने और फसल खराब होने का खतरा किसानों के लिए बड़ी चिंता का कारण था। गीत के जरिए महिला अपने पति को समझाती है कि इस फसल पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है।

इस लोकगीत में खेती की मुश्किलों के साथ उस समय की ग्रामीण महिलाओं की सोच और पारिवारिक जिम्मेदारियों की झलक भी मिलती है। वे अपने पति की मेहनत और परिवार की आर्थिक स्थिति को लेकर चिंतित रहती थीं।

कालबेलिया, चरी और घूमर से भी जुड़ा है गीत

‘जीरो’ लोकगीत केवल गाने तक सीमित नहीं है। इसकी लय और थाप पर राजस्थान के कालबेलिया और चरी जैसे लोकनृत्य भी किए जाते हैं। कई क्षेत्रों में शादी और अन्य विशेष अवसरों पर घूमर नृत्य के दौरान भी इस गीत को गाया जाता है।

राजस्थान की लोकगायिका सीमा मिश्रा ने भी अपनी आवाज में इस गीत को प्रस्तुत किया है, जिससे इसे लोगों के बीच लोकप्रियता मिली। इस तरह ‘जीरो’ लोकगीत राजस्थान की ग्रामीण संस्कृति में खेती के संघर्ष, पारिवारिक प्रेम और महिलाओं की चिंता को एक साथ अभिव्यक्त करता है।

 

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