यूपी में योगी सरकार का बड़ा फैसला, सपा सरकार का मदरसा वेतन विधेयक वापस; 10 साल पुराना मामला हुआ खत्म
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने समाजवादी पार्टी के शासनकाल में वर्ष 2016 में पारित उत्तर प्रदेश मदरसा (अध्यापकों एवं अन्य कर्मचारियों के वेतन का भुगतान) विधेयक, 2016 को विधानमंडल के दोनों सदनों से औपचारिक रूप से वापस ले लिया है। इसके साथ ही लगभग एक दशक से लंबित इस विधेयक का अध्याय समाप्त हो गया। कानूनी और संवैधानिक कारणों के चलते यह विधेयक कभी लागू नहीं हो सका था। राज्यपाल और बाद में केंद्र सरकार की ओर से उठाई गई आपत्तियों के कारण इसे मंजूरी नहीं मिल पाई थी।
समाजवादी पार्टी सरकार ने वर्ष 2016 में मदरसों में कार्यरत शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों को समय पर वेतन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से इस विधेयक को विधानसभा और विधान परिषद से पारित कराया था। सरकार का तर्क था कि इससे वेतन भुगतान की प्रक्रिया नियमित होगी और देरी होने पर जवाबदेही तय की जा सकेगी।
वेतन में देरी पर आपराधिक कार्रवाई का था प्रावधान
विधेयक में यह व्यवस्था प्रस्तावित की गई थी कि यदि मदरसा शिक्षकों और कर्मचारियों का वेतन समय पर नहीं दिया जाता है तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जा सकेगा। इसी प्रावधान समेत कुछ अन्य बिंदुओं पर कानूनी और संवैधानिक सवाल उठे थे, जिसके बाद यह विधेयक विवादों में आ गया।
राज्यपाल ने राष्ट्रपति के विचार के लिए भेजा था विधेयक
दोनों सदनों से पारित होने के बाद विधेयक तत्कालीन राज्यपाल राम नाईक के पास भेजा गया था। राज्यपाल ने इसके कुछ प्रावधानों पर आपत्ति जताते हुए अपनी मंजूरी देने के बजाय इसे राष्ट्रपति के विचारार्थ भेज दिया। संवैधानिक प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति के समक्ष पहुंचने के बाद विधेयक की जांच केंद्रीय गृह मंत्रालय से कराई गई।
गृह मंत्रालय ने जताई थीं कानूनी आपत्तियां
परीक्षण के दौरान केंद्रीय गृह मंत्रालय ने विधेयक के कई प्रावधानों पर आपत्ति दर्ज की। मंत्रालय की ओर से माना गया कि इसमें कुछ ऐसे प्रावधान शामिल हैं जो कानूनी और संवैधानिक दृष्टि से उपयुक्त नहीं हैं। इसके बाद केंद्र सरकार ने इस विधेयक को वापस लेने का सुझाव दिया। इसी वजह से यह कानून कभी लागू नहीं हो पाया और वर्षों तक लंबित रहा।
योगी सरकार ने औपचारिक रूप से खत्म किया मामला
अब योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस लंबित विधेयक को विधानमंडल के दोनों सदनों से वापस लेकर विधायी प्रक्रिया को समाप्त कर दिया है। सरकार का मानना है कि जिस विधेयक को संवैधानिक मंजूरी नहीं मिली और जो कभी कानून नहीं बन सका, उसे लंबित बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं है।
करीब 10 साल तक लंबित रहा विधेयक
वर्ष 2016 में पारित होने के बावजूद यह विधेयक कभी प्रभावी नहीं हो सका। राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के पास भेजे जाने, केंद्रीय गृह मंत्रालय की समीक्षा और संवैधानिक प्रक्रिया के कारण यह वर्षों तक लंबित रहा। इस अवधि में न तो इसके तहत कोई व्यवस्था लागू हुई और न ही इसके प्रावधान प्रभाव में आए। अब इसे वापस लेने के साथ ही इस विधेयक से जुड़ी विधायी प्रक्रिया औपचारिक रूप से समाप्त हो गई।
